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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

Teacher, Student and True learning- inspirational article in Hindi - शिक्षक, शिष्य व सच्ची शिक्षा



शिक्षक, शिष्य व सच्ची शिक्षा

true learning

Teacher, Student and true learning

ऋषि धौम्य का सुरम्य ashram था । यहाँ ऋषि धौम्य अनेको लोगों को शिक्षा का ज्ञान- दान देते थे । अनेकों students यहाँ पढ़ते थे । ऋषि धौम्य एक श्रेष्ठ teacher थे, वे पूरी लगन और श्रद्धा से अपने सभी शिष्यों को पढ़ाते थे, बिना किसी भेद - भाव के । वो कभी राजा के बेटे और साधारण किसान के बेटे में कोई भेद नहीं करते थे । सब को एक समान ही ज्ञान का दान मिलता था ।

ऋषि धौम्य हमेशा ये ध्यान रखते थे, की उनके सभी शिष्यों में सद्गुणों की वृद्धि हो रही है या नहीं, इसके लिए वो अपने सभी students की time to time परीक्षा भी लेते रहते थे ।

एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी । ऐसे में ऋषि धौम्य ने अपने एक बहुत ही होनहार शिष्य आरुणी की परीक्षा लेने की सोची ।

उन्होंने आरुणी को अपने पास बुलाया और कहा –“ बेटा ! तेज बारिश के कारण पास वाले खेत की मेंड़ टूट गयी है, जिसके कारण खेत का पानी बाहर निकला जा रहा है। तुम जाकर मेंड़ बांध आओ ।”

आरुणी तत्काल ही उठा और बोला –“ जैसी आज्ञा प्रभु की ! मैं खेत पर चलता हूँ, कह वह खेत पर चल दिया ।”

आरुणी मेंड़ बनाने लगा, पर water का बहाव बहुत तेज था । इस कारण मेंड़ बार – बार टूट जा रही थी । आरुणी से water रुक नहीं पा रहा था । जब किसी भी उपाय से पानी न रुका तो यह देख आरुणी उस स्थान पर स्वयं लेट गया । इस प्रकार पानी को खेत के बाहर जाने से रोक लिया ।

आरुणी पूरी night ऐसे ही मेंड़ पर लेटा रहा, जिससे पानी रुका रहे ।

true student true teacher and true learning 

इधर बहुत रात्रि बीत जाने पर भी जब आरुणी ashram नहीं लौटा तो ऋषि धौम्य को उसकी चिंता हुई और वे खेत पर उसे ढूंढने पहुँचे । खेत पर जा कर उन्होंने देखा तो आरुणी पानी को रोके मेड़ के पास पड़ा है ।

यह देखते ही ऋषि धौम्य की छाती अपने शिष्य के लिए भर आयी । उन्होंने आरुणी को उठाकर अपने गले से लगा लिया ।

ऋषि धौम्य अपने शिष्य के ऐसे समर्पण पर गर्वान्वित हो उठे ।
            
Friends, सच्ची शिक्षा सिर्फ अक्षर ज्ञान कराने से ही पूर्ण नहीं होती बल्कि सच्ची शिक्षा तो शिष्यों में सद्गुणों को समावेश करने से होती है

सच्ची शिक्षा बड़ी – बड़ी degree लेने व दिलाने में , बड़े –बड़े ग्रन्थों को रटने व रटाने में नहीं है, सच्ची शिक्षा तो व्यक्ति के जीवन में सद्गुणों के बीज रोपित करने व उनको सीचने नें है । सद्गुणों से पूर्ण श्रेष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण में है ।  
  
पर friends,  आज – कल हमारा education sector बहुत ही commercial हो गया है । आज तो शिक्षा पूर्णत: व्यवसाय बन गयी है । जहाँ पहले teacher शिक्षा का दान देना सबसे बड़ा पुन्य का कार्य समझते थे और student योग्य teacher की तलाश में अपना घर बार छोड़ दूर सुदूर में बसे आश्रमों में शिक्षा प्राप्ति के लिए जाते थे । तब teacher भी योग students के इन्तजार में रहते थे जिन्हें वे अपना पूरा अर्जित ज्ञान प्रदान कर सकें । और इस शिक्षा दान के बदले जो गुरु दक्षिणा मिल जाती थी उसे वो सहर्ष स्वीकार कर लेते थे और students भी अपने teacher की माँगी दक्षिणा हर – हाल में अपना जीवन अर्पण कर देते थे । दोनों लोगों के बीच पूर्ण समर्पण के भाव होते थे... गुरु शिष्य को सब कुछ अपना सिखा देने को आकुल और शिष्य सब कुछ सीख लेने को तत्पर । पर आज.... कहाँ गयी ऐसी शिक्षा प्रणाली जो सद्गुणों की खान जैसे शिष्य बना सके... ?

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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

Don’t say you don’t have enough time- A personal development article in Hindi



Don’t say you don’t have enough time


हम सब को God की तरफ से एक दिन में एक सा, एक ही वक्त दिया है- पूरे 24 hours. yes friends, हम सब अक्सर ये कहते रहते हैं कि हमारे पास समय ही नहीं है नहीं तो मैं ये करता, वो करता, पर क्या करे हमारे पास तो समय ही नहीं बचता जो हम अपनी life में कुछ अलग कर सकें । पता नहीं लोग कैसे कर लेते हैं। हम भी अपनी country और इस society के लिए कुछ करना तो चाहते हैं..पर...!!!  God पर blame डाल देते हैं.. एक तो हमारे पास time नहीं दूसरे कुछ अलग करना हमारे जैसे साधारण लोगों का काम ही नहीं.. इसके लिए तो विरला होना पड़ता है जो God ने हमें बनाया ही नहीं।

friends, Don’t say you don’t have enough time. आप सब के पास भी श्री राम शर्मा आचार्य, मदर टेरेसा, महात्मा गाँधी, अल्बर्ट आइंस्टीन, बराक ओबामा, और डॉ राजेंद्र प्रसाद और सभी बड़े – बड़े काम करने वालों के जीवन में God ने every day, केवल 24 hours ही दिए थे । और इन लोगों ने इन 24 hours का ही सही तरीके से अपनी life में समायोजन कर सदुपयोग कर वो कार्य किये जिसे हम लोग नहीं कर पाते और कहते हैं कि ये कार्य तो साधारण लोगों के बस कि बात नहीं इसे तो विरले लोग ही कर सकते हैं ।

पर ऐसा नहीं है ये कार्य हम सभी लोग कर सकते हैं बस जरूरत है तो केवल जागरूकता की अपने समय के प्रति, अपनी क्षमताओं के प्रति। गर हम अपनी क्षमताओं को जानते हुए, अपने जीवन लक्ष्य का सही निर्धारण करते हुए, अपने समय का सदुपयोग करते हैं तो हम सब भी अपने जीवन में वो कार्य कर सकते हैं जिन्हें हम असाधारण कहते हैं और मानते हैं कि ये कार्य महान और विरले लोग ही कर सकते हैं ।

God ने हम सभी को एक समान ही अवसर दिए हैं किसी को कम या ज्यादा नहीं क्योकि God किसी के साथ भी अन्याय नहीं करता उसकी दृष्टि में तो हम सब एक समान ही हैं बस जरूरत है तो हमें स्वयं को पहचान ने की और अपने पास मौजूद साधनों के सही दिशा में उपयोग की । जब हम ऐसा करने लगेगें तो हमारे यही 24 hours हमारे लिए पर्याप्त हो जायेंगे और हम भी इतने ही समय में वो कर सकेगें जो दूसरे महान लोगों ने किये थे और अपना नाम history में लिखवा गये।

So friends, if you want to become a successes full position in your life, then don’t say, you don’t have enough time.
       

          
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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

Who is more important - spirit, mind or body?- it is a inspirational thoughts in Hindi-(किसका महत्व ज्यादा- भावना, बुद्धि या शरीर ?)


किसका महत्व ज्यादा- भावना, बुद्धि या शरीर ?

spirit, mind, or body

एक बार भावना, बुद्धि और शरीर तीनो आपस में मस्ती मजाक कर रहे थे , और हँसी मजाक करते- करते अचानक उनमें आपस में बहस छिड़ गयी कि उनमें कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ? शरीर ने कहा- “ मैं मनुष्य के अस्तित्व का प्रतीक हूँ । मुझ से ही मनुष्य कि पहचान होती है । यदी मैं न होता तो मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं कर पता और ना ही अपनी भावनाओं को प्रकट कर पाता । मेरे ही माध्यम से आप दोनों स्वयं को दुनिया के सामने प्रकट कर पाते हो मेरे बिना आप दोनों का कोई अस्तित्व ही नहीं है इसलिए मैं आप दोनों से ज्यादा महत्वपूर्ण हूँ ।“

इस पर बुद्धि बोली - “ मेरे ना होने से मनुष्य पुर्णतः बेकार हो जायेगा उसका जीवन जीव- जंतु व जानवरों से जरा सा भी भिन्न नहीं होगा । उसके आचरण और जानवरों के आचरण में कोई अंतर नहीं होगा । मनुष्य ने जो भी प्रगति कि है मेरे कारण कि है मेरे बीबा वह विकास के साधन नहीं बना सकता मेरे बिना तो विकास ही असंभव है। मेरे अस्तित्व से ही मनुष्य का विकास संभव है मेरे बिना ये सब मूल्य हीन है ।”

शरीर और बुद्धि कि बातों को सुन कर भावना बोली –“ मनुष्य के जीवन में संस्कार, समृद्धि, विकास और सुंदरता ये सब भावनावों के कारण हैं । भावनाओं के आभाव में मनुष्य और जड़ पदार्थों ( ईट – पत्थर) में क्या अंतर रह जायेगा ? इसलिए आप सब में मैं ही सब से ज्यादा महत्वपूर्ण हूँ।"

शरीर, बुद्धि और भावना के इस वार्त्तालाप को छीर – सागर में बैठे सच्चिदानंद God Vishnu सुन रहे थे । प्रभु सम्पूर्ण वार्त्तालाप को सुन कर मुस्कुरा उठे और उन तीनों से बोले –“ मनुष्य का जीवन तुम तीनों के बिना अधूरा है । तुम तीनों के कारण ही मनुष्य जीवन बहुमूल्य बनता है । तुम में से किसी एक के भी ना होने से उस के जीवन में असंतुल आ जाएगा । वो अपना न तो विकास कर पायेगा न अपने अस्तित्व का बरकरार रख पायेगा । मैंने मनुष्य को अतुल्य शरीर, प्रखर और असीम बुद्धि, और अनंत भावनाएँ दी हैं । जिससे वह तुम सब में  समुचित संतुलन बना कर, तुम तीनों का अपने जीवन में समग्र व उचित उपयोग कर अपने जीवन को उन्नत कर सके । तुम तीनों ही उसे जीवन में वरदान हो ।”


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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

The base of success – The only goal setting



सफलता  का आधार- एक ही लक्ष्य का निर्धारण



                
एक युवा हो रहे किशोर ने एक rich man का ठाठ-बांट देखा और उससे inspire हो उसने सोचा कि मुझे भी इस व्यक्ति कि तरह धनवान बनना चाहिए,

फिर ये सोच कर, वह कई दिन तक उसी rich man कि तरह कमाई करने का प्रयास किया, और कुछ paise भी कमा लिए,

पर इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान पुरुष से हुई, वह किशोर विद्वान कि वाक्पटुता से प्रभावित हो कर कमाई करना छोड़ दिया और विद्वान बनने के लिए पढ़ने में लग गया, अभी वह थोड़ा-बहुत ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हो गई, उस संगीतज्ञ से मिल कर उसे संगीत में अधिक आकर्षण लगा, उस दिन से उसने study बंद कर दी, और music  सीखना आरम्भ कर दिया.... इसी प्रकार वह हर बार नयी चीजों से आकर्षित होता रहता और पुराने को छोड़ता जाता...,

    इस तरह उसकी काफी age बीत गई पर न तो वह paisa वाला बन पाया, न ही विद्वान, न संगीतज्ञ, न समाजसेवी और न ही एक नेता,       
एक दिन अपने कुछ न बन पाने के इस दुःख को उसने एक महात्मा को बताया, महात्मा ने उस कि बात सुन कर कहा-“ बेटा सारी दुनियाँ में तरह-तरह का आकर्षण भरा पड़ा है, तुम एक निश्चय करो कि तुम्हें क्या पाना है या बनना है और जीते जी उसी पर अमल करो, तुम्हारी उन्नति अवश्य होगी, कई जगह गड्ढ़े खोदोगे तो न पानी मिलेगा और न कुआँ बना पाओगे,”
    
युवक, महात्मा जी कि कही बात का संकेत समझ गया और फिर एकनिष्ठ भाव से एक लक्ष्य  निर्धारित कर, उसे प्राप्ति में लग गया,

                   
Note: The motivational story shared here is not my original creation, I have read it before and I am just providing it in my own way in Hindi language.


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